3. मानव विकास

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प्रत्यक्ष रूप से ऐसा माना जाता है कि ‘विकास स्वतंत्रता है’, जिसका संबंध प्रायः आधुनिकीकरण, अवकाश, सुविधा और समृद्धि से जुड़ा हुआ है।

वर्तमान संदर्भ में कंप्यूटरीकरण, औद्योगीकरण, सक्षम परिवहन और संचार जाल बृहत् शिक्षा
प्रणाली, उन्नत और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, वैयक्तिक सुरक्षा इत्यादि को विकास का प्रतीक समझा जाता है। प्रत्येक व्यक्ति, समुदाय एवं सरकार अपने निष्पादन तथा विकास स्तर
को इन वस्तुओं की उपलब्धता तथा गम्यता के संदर्भ में मापते हैं।

इस प्रकार, भारत के महानगरीय केंद्रों और अन्य विकसित अंतर्वेशों (इनक्लेव) जैसे कुछ क्षेत्र हैं जहाँ इनकी जनसंख्या के एक छोटे से खंड को आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। दूसरे छोर पर विशाल ग्रामीण क्षेत्र और नगरीय क्षेत्रों की गंदी बस्तियाँ हैं जिनमें पेयजल, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाएँ और अवसंरचना इनकी अधिकांश जनसंख्या के लिए उपलब्ध नहीं है।

यदि हमारे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच विकास के अवसरों का वितरण देखा जाए तो स्थिति और अधिक चिंताजनक प्रतीत होती है। अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, भूमिहीन कृषि मजदूरों, गरीब किसानों और गंदी बस्तियों में बड़ी संख्या में रहने वाले लोगों इत्यादि का बड़ा समूह सर्वाधिक हाशिए पर है। स्त्री जनसंख्या का बड़ा खंड इन सबमें से सबसे ज्यादा कष्टभोगी है।

विकास का एक अन्य अंतर संबंधित पक्ष भी है जिसका मानवीय दशाओं से सीधा संबंध है। इसका संबंध पर्यावरणीय प्रदूषण से है जो पारिस्थितिक संकट का कारक है। वायु, मृदा, जल और ध्वनि प्रदूषण न केवल ‘हमारे साझा संसाधनों की त्रासदी’ का कारण बने हैं अपितु हमारे समाज के अस्तित्व के लिए भी खतरा बन गए हैं।

परिणामस्वरूप, निर्धनों में सामर्थ्य के गिरावट के लिए तीन अंतर्संबंधित प्रक्रियाएँ कार्यरत हैं- (क) सामाजिक सामर्थ्य में कभी विस्थापन और दुर्बल होते सामाजिक बंधनों के कारण

(ख) पर्यावरणीय सामर्थ्य में कभी प्रदूषण के कारण, और

(ग) व्यक्तिगत सामर्थ्य में कभी बढ़ती बीमारियों और दुर्घटनाओं के कारण।
अंतत: उनके जीवन की गुणवत्ता और मानव विकास पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

1990 ई. में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा प्रथम मानव विकास रिपोर्ट का प्रकाशन है। तब से यह संस्था प्रतिवर्ष विश्व मानव विकास रिपोर्ट को प्रकाशित करती आ रही है। यह रिपोर्ट न केवल मानव विकास को परिभाषित करती है व इसके सूचकों में संशोधन और
परिवर्तन लाती है अपितु परिकलित स्कोरों के आधार पर विश्व के देशों का कोटि-क्रम भी बनाती है।

मानव विकास क्या है?
“मानव विकास, स्वस्थ्य भौतिक पर्यावरण से लेकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता तक सभी प्रकार के मानव विकल्पों को सम्मिलित करते हुए लोगों के विकल्पों में विस्तार और उनके शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तथा सशक्तीकरण के अवसरों में वृद्धि की प्रक्रिया है।” दीर्घ और स्वस्थ जीवन जीना, शिक्षित होना और राजनीतिक स्वतंत्रता, गारंटीकृत मानवाधिकारों और व्यक्तिगत आत्मसम्मान से युक्त शिष्ट जीवन स्तर के लिए आवश्यक संसाधनों तक पहुँच आवश्यक है

यह भी उल्लेख करता है कि “विकास लोगों को केंद्र में रखकर बुना जाना चाहिए न कि विकास को लोगों के बीच रखकर” जैसा कि पहले होता था।

भारत में मानव विकास 109 करोड़ से अधिक जनसंख्या के साथ भारत मानव विकास सूचकांक के संदर्भ में विश्व के 172 देशों में 127 के कोटि क्रम पर है। HDI के संयुक्त मूल्य 0.602 के साथ भारत मध्यम मानव विकास दर्शाने वाले (UNDP 2005) देशों की
श्रेणी में आता है।

उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नव-साम्राज्यवाद जैसे ऐतिहासिक कारकों; मानवाधिकार उल्लंघन, प्रजाति, धर्म, लिंग और जाति के आधार पर सामाजिक भेदभाव जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक कारक; अपराध, आतंकवाद और युद्ध जैसी सामाजिक समस्याएँ और राज्य की प्रकृति, सरकार का स्वरूप (लोकतंत्र अथवा तानाशाही), सशक्तिकरण का स्तर जैसे राजनीतिक कारकों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव जैसे कुछ कारक हैं जो मानव विकास की प्रकृति के निर्धारण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

यू.एन.डी.पी. द्वारा चुने गए सूचकों का प्रयोग करते हुए भारत के योजना आयोग ने भी भारत के लिए मानव विकास रिपोर्ट तैयार की है। इसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विश्लेषण की इकाई के रूप में प्रयोग किया गया है।

आर्थिक उपलब्धियों के सूचक समृद्ध संसाधन आधार और इन संसाधनों तक सभी, विशेष रूप
से निर्धन, पद-दलित और हाशिए पर छोड़ दिए गए लोगों की पहुँच, उत्पादकता, कल्याण और मानव विकास की कुंजी है।
सकल घरेलू उत्पादन और इसकी प्रति व्यक्ति उपलब्धता को किसी देश के संसाधन आधार का माप माना जाता है।

भारत का सकल घरेलू उत्पाद (प्रचलित कीमतों पर) 3200 करोड़ रु.था और इस प्रकार प्रचलित कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय 20,813 रु. थी।

महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली जैसे कुछ विकसित राज्य हैं जिनकी प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष आय 4,000 रु. (1980-81 की कीमतों पर आधारित आँकड़े) है लेकिन उत्तर
प्रदेश, बिहार, उडीसा, मध्य प्रदेश, असम, जम्म और कश्मीर इत्यादि जैसे बड़ी संख्या में गरीब राज्य भी हैं जिनकी प्रति व्यक्ति आय 2,000 रु. प्रतिवर्ष से कम है।

पंजाब, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में इसका आकलन 690 रु. प्रति व्यक्ति प्रति माह से अधिक और उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश इत्यादि में 520 रु. प्रति व्यक्ति प्रति माह से कम किया गया था।

ये भिन्नताएँ गरीबी, बेरोजगारी और अपूर्ण रोज़गारी जैसी गहरी पैठ वाली आर्थिक समस्याओं की ओर संकेत करती है।


उडीसा और बिहार जैसे राज्यों में उनकी 40 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे जी रही है। मध्य प्रदेश, सिक्किम, असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड राज्यों की 30 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे है।

“गरीबी वंचित रहने की अवस्था है। निरपेक्ष रूप से यह व्यक्ति की सतत, स्वस्थ और
यथोचित उत्पादक जीवन जीने के लिए आवश्यक ज़रूरतों को संतुष्ट न कर पाने की असमर्थता को प्रतिबिंबित करती है।”
शिक्षित युवाओं के रोज़गार की दर 25 प्रतिशत है। बिना रोजगार की आर्थिक वृद्धि और अनियंत्रित बेरोजगारी भारत में गरीबी के अधिक होने के महत्त्वपूर्ण कारणों में से हैं।


स्वस्थ जीवन के सूचक रोग और पीड़ा से मुक्त जीवन और लम्बी आयु एक स्वस्थ जीवन के सूचक हैं। शिशु मृत्यु दर और माताओं में प्रजनन मृत्यु दर को घटाने के उद्देश्य से पूर्व और प्रसवोत्तर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, वृद्धों के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ, पर्याप्त पोषण और व्यक्तियों की सुरक्षा एक स्वस्थ और लंबे जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण माप हैं।

कुछ स्वास्थ्य सूचकों के क्षेत्र में भारत में सराहनीय कार्य किया है,

जैसे मृत्यु दर का 1951 में 25.1 प्रतिशत से घटकर 1999 में 8.1 प्रति हजार होना और इसी
अवधि में शिशु मृत्यु दर का 148 प्रति हजार से 70 प्रति हज़ार होना। इसी प्रकार 1951 से 1999 की अवधि में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा में पुरुषों के लिए 37.1 वर्ष से 62.3 वर्ष तथा स्त्रियों के लिए 36.2 वर्ष से 65.3 वर्ष की वृद्धि करने में भी सफलता मिली।

इसी प्रकार, इसी अवधि के दौरान भारत ने जन्म दर को 40.8 से 26.1 तक नीचे लाकर अच्छा कार्य किया है, किंतु यह जन्म दर अभी भी अनेक विकसित देशों की तुलना में काफ़ी ऊँची है।

भारत में स्त्री लिंगानुपात घट रहा है। भारत की जनगणना (2001) के निष्कर्ष, विशेष रूप से 0-6 आयु वर्ग के बच्चों के लिंग अनुपात के संबंध में, बहुत ही अवांछनीय हैं। यदि केरल को अपवाद मान लिया जाए तो सभी राज्यों में बच्चों का लिंग अनुपात घटा है और पंजाब और हरियाणा जैसे विकसित राज्यों में यह सबसे अधिक चिंताजनक है जहाँ यह लिंगानुपात प्रति हजार बालकों की तुलना में 800 बालिकाओं से भी नीचे है।


सामाजिक सशक्तिकरण के सूचक ‘विकास मुक्ति है।’ भूख, गरीबी, दासता, बंधुआकरण, अज्ञानता, निरक्षरता और किसी की अन्य प्रकार की प्रबलता से मुक्ति मानव विकास की कुंजी है। वास्तविक अर्थों में मुक्ति तभी संभव है जब लोग समाज में अपने सामों और विकल्पों के
प्रयोग के लिए सशक्त हों और प्रतिभागिता करें।

समाज और पर्यावरण के बारे में ज्ञान तक पहुँच ही मुक्ति का मूलाधार है। ज्ञान और मुक्ति का रास्ता साक्षरता से होकर जाता है।

भारत में कुल साक्षरता लगभग 65.4 प्रतिशत है जबकि स्त्री साक्षरता 54.16 प्रतिशत है।
दक्षिण भारत के अधिकांश राज्यों में कुल साक्षरता और महिला साक्षरता राष्ट्रीय औसत से ऊँची है।
भारत के राज्यों में साक्षरता दर में व्यापक प्रादेशिक असमानता पाई जाती है। यहाँ बिहार जैसे राज्य भी हैं जहाँ बहुत कम (47.53 प्रतिशत) साक्षरता है और केरल और मिज़ोरम जैसे राज्य भी हैं जिनमें साक्षरता दर क्रमश: 90.92 प्रतिशत और 88.49 प्रतिशत है।

ग्रामीण क्षेत्रों और स्त्रियों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, कृषि मजदूरों इत्यादि
जैसे हमारे समाज में सीमांत वर्गों में साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है।

भारत को मध्यम मानव विकास दर्शाने वाले देशों में रखा गया है। विश्व के 172 देशों में इसका 127वाँ स्थान है। भारत के विभिन्न राज्यों में 0.638 संयुक्त सूचकांक मूल्य के साथ केरल कोटिक्रम में सर्वोच्च है। इसके बाद पंजाब (0.537), तमिलनाडु (0.531), महाराष्ट्र (0.523) और हरियाणा (0.509) आते हैं। अपेक्षा के अनुरूप बिहार (0.367), असम (0.386), उत्तर प्रदेश (0.388), मध्य प्रदेश (0.394) और उड़ीसा (0.404) जैसे राज्य देश के 15 प्रमुख राज्यों में सबसे नीचे हैं।

ऐसी हालातों के लिए अनेक सामाजिक-राजनीतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारण उत्तरदायी हैं। केरल के मानव विकास सूचकांक का उच्चतम मूल्य इसके द्वारा 2001 में शत- प्रतिशत के आसपास (90.92 प्रतिशत) साक्षरता दर को प्राप्त करने के लिए किए गए प्रभावी कार्यशीलता के कारण है।

एक अलग दृश्य में बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, असम और उत्तर प्रदेश जैसे निम्न साक्षरता वाले राज्य हैं। उदाहरणत: बिहार में इसी वर्ष (2001) में कुल साक्षरता दर बहुत निम्न (60.32
प्रतिशत) थी।

उच्चतर कुल साक्षरता दर्शाने वाले राज्यों में पुरुष और स्त्री साक्षरता के बीच कम अंतर पाया गया है। केरल में यह अंतर 6.34 प्रतिशत है जबकि बिहार में यह 26.75 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 25.95 प्रतिशत है।

शैक्षिक उपलब्धियों के अतिरिक्त आर्थिक विकास भी मानव विकास सूचकांक पर सार्थक प्रभाव डालता है। आर्थिक दृष्टि से विकसित महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पंजाब एवं हरियाणा
जैसे राज्यों के मानव विकास सूचकांक का मूल्य असम, बिहार, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों की तुलना में ऊँचा है।

उपनिवेश काल में विकसित प्रादेशिक विकृतियाँ और सामाजिक विषमताएँ अब भी भारत की अर्थव्यवस्था, राजतंत्र और समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

मानव विकास विशेष रूप से सामाजिक विज्ञानों में प्रयुक्त होने वाली एक जटिल संकल्पना
है। यह जटिल है क्योंकि युगों से यही सोचा जा रहा है कि विकास एक मूलभूत संकल्पना है और यदि एक बार इसे प्राप्त कर लिया गया तो यह समाज की सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय समस्याओं का निदान हो जाएगा।

अगर देखा जाये तो विकास ने मानव जीवन की गुणवत्ता में अनेक प्रकार से महत्त्वपूर्ण सुधार किया है किंतु प्रादेशिक विषमताएँ, सामाजिक असमानताएँ, भेदभाव, वंचना, लोगों का विस्थापन, मानवाधिकारों पर आघात और मानवीय मूल्यों का विनाश तथा पर्यावरणीय
निम्नीकरण भी बढ़ा है।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने अपनी 1993 की मानव विकास रिपोर्ट में विकास की अवधारणा में अभिभूत कुछ स्पष्ट पक्षपातों और पूर्वाग्रहों को संशोधित करने का प्रयत्न
किया है। लोगों की प्रतिभागिता और उनकी सुरक्षा 1993 की मानव विकास रिपोर्ट के प्रमुख मुद्दे थे।

इसमें मानव विकास की न्यूनतम दशाओं के रूप में उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण और लोगों के बढ़ते सशक्तीकरण पर बल दिया गया था। रिपोर्ट ने शांति और मानव विकास लाने में नागरिक समाजों की बहुत बड़ी सकारात्मक भूमिका को भी स्वीकार किया।

नागरिक समाजों को विकसित देशों द्वारा प्रतिरक्षा खर्चों में कटौती, सशस्त्र बलों के अपरियोजन, प्रतिरक्षा से आधारभूत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की ओर संक्रमण और विशेष रूप से
निशस्त्रीकरण तथा नाभिकीय युद्धास्त्रों की संख्या घटाने के लिए जनमत तैयार करने की दिशा में कार्य करना चाहिए।

एक नाभिकीय-कृत विश्व में शांति और कल्याण दो प्रमुख वैश्विक चिंताएँ हैं।

इस उपागम के दूसरे छोर पर नव-माल्थस वादियों, पर्यावरणविदों और आमूलवादी पारिस्थितिकविदों द्वारा व्यक्त विचार हैं। उनका विश्वास है कि एक प्रसन्नचित्त एवं शांत
सामाजिक जीवन के लिए जनसंख्या और संसाधनों के बीच उचित संतुलन एक आवश्यक दशा है।

इन विचारकों के अनुसार जनसंख्या और संसाधनों के बीच का अंतर 18वीं शताब्दी के बाद बढ़ा है। विगत 300 वर्षों में विश्व के संसाधनों में बहुत थोड़ी वृद्धि हुई है जबकि मानव जनसंख्या में विपुल वृद्धि हुई है।

विकास ने केवल विश्व के सीमित संसाधनों के बहुविध प्रयोगों को बढ़ाने में योगदान दिया है जबकि इन संसाधनों की माँग में अतिशय वृद्धि हुई है। इस प्रकार विकास के किसी भी क्रियाकलाप के समक्ष महत्वपूर्ण कार्य जनसंख्या और संसाधनों के बीच समता बनाए रखना है।

सर राबर्ट माल्थस मानव जनसंख्या की तुलना में संसाधनों के अभाव के विषय में चिंता व्यक्त करने वाले पहले विद्वान थे।


संसाधनों की उपलब्धता का होना इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि उनका सामाजिक वितरण। संसाधन हर जगह असमान रूप से वितरित हैं। समृद्ध देशों और लोगों की संसाधनों के
विशाल भंडारों तक पहुँच’ है जबकि निर्धनों के संसाधन कम होते जा रहे हैं।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता लंबे समय से ही जनसंख्या, संसाधनों और विकास के प्रति संवेदनशील रही हैं।

क्लब ऑफ़ रोम की रिपोर्ट ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ (1972),
शूमाकर की पुस्तक ‘स्माल इज़ ब्यूटीफुल’ (1974) बॅडलैंड
कमीशन की रिपोर्ट ‘ऑवर कामन फ्यूचर’ (1987) और अंत
में ‘एजेंडा-21 रिपोर्ट ऑफ़ द रियो कान्फेरेंस’ (1993)

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