10. परिवहन तथा संचार

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परिवहन वस्तुओं को उत्पादन स्थलों से बाज़ार तक पहुँचाता है जहाँ ये उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध होते हैं।



स्थल परिवहन
भारत में मार्गों एवं कच्ची सड़कों का उपयोग परिवहन के लिए प्राचीन काल से किया जाता रहा है। आर्थिक तथा प्रौद्योगिक विकास के साथ भारी मात्रा में सामानों तथा लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए पक्की सड़कों तथा रेलमार्गों का विकास किया गया है। रज्जुमार्गों, केबिल मार्गों तथा पाइप लाइनों जैसे साधनों का विकास विशिष्ट सामग्रियों को विशिष्ट परिस्थितियों में परिवहन की माँग को पूरा करने के लिए किया गया।


Q. सड़क परिवहन की मुख्य विशेषता बताये l
भारत का सड़क जाल विश्व के विशालतम सड़क-जालों में से एक है। इसकी कुल लंबाई 33.1 लाख कि.मी. (2005 में) है। यहाँ प्रतिवर्ष सड़कों द्वारा लगभग 85 प्रतिशत यात्री तथा 70 प्रतिशत भार यातायात का परिवहन किया जाता है। छोटी दूरियों की यात्रा के लिए सड़क परिवहन अपेक्षाकृत अनुकूल होता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में सड़कों की दशा सुधारने के लिए एक बीस वर्षीय सड़क योजना 1961 में आरंभ की गई। हालांकि, सड़कों का संकेंद्रण नगरों एवं उनके आसपास के क्षेत्रों में ही रहा। ग्रामीण एवं सुदूर क्षेत्रों से सड़कों द्वारा संपर्क लगभग नहीं के बराबर था।

निर्माण एवं रख-रखाव के उद्देश्य से सड़कों को राष्ट्रीय महामार्गों (NR). राज्य महामार्गो (SH). प्रमुख जिला सड़कों तथा ग्रामीण सड़कों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

Q. भारतीय सड़क मार्गो को विभिन्न प्रकारो में बाटो l
1. राष्ट्रीय महामार्ग
वे प्रमुख सड़कें, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा निर्मित एवं अनुरक्षित किया जाता है, उसे राष्ट्रीय महामार्ग कहा जाता है। इन सड़कों का उपयोग अंतर्राज्यीय परिवहन तथा सामरिक क्षेत्रों तक रक्षा सामग्री एवं सेना के आवागमन के लिए होता है।

ये महामार्ग राज्यों की राजधानियों, प्रमुख नगरों, महत्वपूर्ण पत्तनों तथा रेलवे जंक्शनों को भी जोड़ते हैं। राष्ट्रीय महामार्गों की लंबाई 1951 में 19,700 कि.मी. से बढ़कर, 2005 में 65,769 कि.मी. हो गई है।

राष्ट्रीय महामार्गों की लंबाई पूरे देश की कुल सड़कों की लंबाई की मात्र 2 प्रतिशत है। किंतु ये सड़क यातायात के 40 प्रतिशत भाग का वहन करते हैं

भारतीय राष्ट्रीय महामार्ग प्राधिकरण (एन.एच.ए.आई.) का प्रचालन 1995 में हुआ था। यह भूतल परिवहन मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी निकाय है। इसे राष्ट्रीय महामार्गों के विकास, रख-रखाव तथा प्रचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इसके साथ ही यह राष्ट्रीय महामार्गों के रूप में निर्दिष्ट सड़कों की गुणवत्ता सुधार के लिए एक शीर्ष संस्था है।

2. राज्य महामार्ग
इन मार्गों का निर्माण एवं अनुरक्षण राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। ये राज्य की राजधानी से जिला मुख्यालयों तथा अन्य महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ते हैं। ये मार्ग राष्ट्रीय महामार्गों से जुड़े होते हैं। इनके अंतर्गत देश की कुल सड़कों की लंबाई का 4 प्रतिशत भाग आता है। ये प्रशासनिक दृस्टि से महत्वपूर्ण है अमृतसर-चंडीगढ़ मार्ग एक राजकीय महामार्ग है

3. जिला सड़कें
ये सड़कें जिला मुख्यालयों तथा जिले के अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के बीच संपर्क मार्ग का कार्य करती हैं। इनके अंतर्गत देश-भर की कुल सड़कों की लंबाई का 14 प्रतिशत भाग आता है।


4. ग्रामीण सड़कें
ये सड़कें ग्रामीण क्षेत्रों को आपस में जोड़ने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। भारत की कुल सड़कों की लंबाई का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण सड़कों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

5. अन्य सड़कें
अन्य सड़कों के अंतर्गत सीमांत सड़कें एवं अंतर्राष्ट्रीय महामार्ग आते हैं। मई 1960 में सीमा सड़क संगठन (बी.आर.ओ.) को देश की उत्तरी एवं उत्तर-पूर्वी सीमा से सटी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सड़कों के तीव्र और समन्वित सुधार के माध्यम से आर्थिक विकास को गति देने एवं रक्षा तैयारियों को मजबूती प्रदान करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था।

यह एक अग्रणी बहुमुखी निर्माण अभिकरण है। इसने अति ऊँचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में चंडीगढ़ को मनाली (हिमाचल प्रदेश) तथा लेह (लद्दाख) से जोड़ने वाली सड़क बनाई है। यह सड़क समुद्र तल से औसतन 4270 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है

यह संगठन मार्च 2005 तक 40 450 कि.मी. से अधिक लंबाई की सड़कें तैयार कर चुका है। सामरिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में सड़कें बनाने व अनुरक्षण करने के साथ-साथ बी.आर.ओ. अति ऊँचाइयों वाले क्षेत्रों में बर्फ हटाने की ज़िम्मेदारी भी संभालता है।

अंतर्राष्ट्रीय महामार्गों का उद्देश्य
पड़ोसी देशों के बीच भारत के साथ प्रभावी संपर्कों को उपलब्ध कराते हुए सद्भावपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देना है

Q. भारत में सड़को का वितरण सामान नहीं है स्पस्ट करे l
हमारे देश में सड़कों का वितरण समरूप नहीं है। सड़कों का घनत्व का अर्थ है प्रति 100 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में सड़को की लम्बाई 75.42 कि.मी. राष्ट्रीय औसत के साथ जम्मू और कश्मीर में मात्र 10.48 कि.मी. सड़को का घनत्व है केरल में 387.24 कि.मी. तक मिलता है। अधिकतर उत्तरी राज्यों तथा प्रमुख दक्षिण भारतीय राज्यों में सड़कों का घनत्व ऊँचा है। यह हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान में निम्न है। यह भिन्नता भूभाग की प्रकृति तथा आर्थिक विकास का स्तर सड़कों के घनत्व के प्रमुख निर्धारक हैं।


मैदानी क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण आसान एवं सस्ता होता है; जबकि पहाड़ी एवं पठारी क्षेत्रों में कठिन एवं महँगा होता है। इसलिए, मैदानी क्षेत्रों की सड़कें न केवल घनत्व बल्कि सड़कों
की गुणवत्ता की दृष्टि से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों, बरसाती तथा वनीय क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत बढ़िया होती हैं।

Q. भारत में रेल मार्गो का महत्व बताओ
भारतीय रेल जाल विश्व के सर्वाधिक लंबे रेल जालों में से एक है। भारतीय रेलों का जाल एशिया में प्रथम लेकिन विश्व में चौथा स्थान है, यह माल एवं यात्री परिवहन को सुगम बनाने के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि में भी योगदान देता है।
भारतीय रेल की स्थापना 1853 में हुई तथा मुंबई (बंबई) से थाणे के बीच 34 कि.मी. लंबी रेल लाइन निर्मित की गई।
भारतीय रेल जाल की कुल लंबाई 63,221 कि.मी. है। जिस पर लगभग 12670 गाड़िया चलती है भारतीय रेल को 16 मंडलों में विभाजित किया गया है।


ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान से ही शहरी क्षेत्र, कच्चा माल/सामग्री उत्पादन क्षेत्र, बागान तथा अन्य व्यावसायिक फ़सल क्षेत्र, पहाड़ी स्थल तथा छावनी क्षेत्र रेलमार्गों से अच्छी
तरह जुड़े हुए थे। ये मुख्य रूप से संसाधनों के शोषण हेतु विकसित किए गए थे।

देश की स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद इन रेलमार्गों का विस्तार अन्य क्षेत्रों में भी किया गया। इसमें
सर्वाधिक महत्वपूर्ण कोंकण रेलवे का विकास है जो भारत के पश्चिमी समुद्री तट के साथ मुंबई और मैंगलोर के बीच सीधा संपर्क उपलब्ध कराता है।


Q. जल परिवहन की मुख्य लाभ बताओ l
1. भारत में जलमार्ग यात्री तथा माल वहन, दोनों के लिए परिवहन की एक महत्वपूर्ण विधा है। 2. यह परिवहन का सबसे सस्ता साधन है 3. भारी सामग्री के परिवहन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। 4. यह ईंधन-दक्ष तथा पारिस्थितिकी अनुकूल परिवहन प्रणाली है।

 जल परिवहन दो प्रकार का होता है
(क) अन्तः स्थलीय जलमार्ग और (ख) महासागरीय जलमार्ग


अंत:स्थलीय जलमार्ग
रेलमार्गों के आगमन से पहले यह परिवहन की प्रमुख विधा थी। इसके अतिरिक्त, नदियों के जल को सिंचाई हेतु बाँट देने के कारण इनके मार्गों के अधिकांश भाग नौसंचालन के योग्य नहीं रहे हैं। इस समय भारत में 14,500 कि.मी. लंबा जलमार्ग नौकायन हेतु उपलब्ध है जो देश के परिवहन में लगभग 1% का योगदान देता है।

इसके अंतर्गत नदियाँ, नहरें, पश्च जल तथा सँकरी खाड़ियाँ आदि आती हैं। वर्तमान में 3,700 कि.मी. प्रमुख नदी जलमार्ग चपटे तल वाले व्यापारिक जलपोतों द्वारा नौकायन योग्य है जिसमें से मात्र 2,000 कि.मी. का ही वास्तविक उपयोग होता है। उसी प्रकार 4,300 कि.मी. नौकायन योग्य नहरों में से मात्र 900 कि.मी. जलमार्ग यंत्रीकृत जलयानों द्वारा नौकायन योग्य है।
Q. भारत में राष्ट्रीय जलमार्गो के वितरण बताओ l अथवा भारत के तीन राष्ट्रीय जलमार्ग कौन से है ?
देश में राष्ट्रीय जलमार्गों के विकास, अनुरक्षण तथा नियमन हेतु 1986 में अंत: स्थलीय जलमार्ग प्राधिकरण स्थापित किया गया था। इस समय देश में तीन राष्ट्रीय जलमार्ग है 1. गंगा भागीरथी– हुगली नदी तंत्र का इलाहबाद और हल्दिया के बीच का मार्ग (1620 की. मी.) 2. राष्ट्रीय जलमार्ग 2. ब्रम्पुत्र नदी का सादिया-धुबरी भाग (891 की मी ) और राष्ट्रीय जलमार्ग 3. पश्चिम तट नहर का कोटपुरम में कोल्लम खंड तथा उद्योग मंडल और चम्पकरा नहरे (205 की मी )


केरल के पश्च जल (कडल) का अंत: स्थलीय जलमार्गों में अपना एक विशिष्ट महत्व है। ये परिवहन का सस्ता साधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ केरल में भारी संख्या में पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं।

यहाँ की प्रसिद्ध नेहरू ट्रॉफी नौकादौड़ (वल्लानकाली) भी इसी पश्च जल में आयोजित की जाती है।


महासागरीय मार्ग
भारत के पास द्वीपों सहित लगभग 7,517 कि.मी. लंबा व्यापक समुद्री तट है। 12 प्रमुख तथा 185 गौण पत्तन इन मार्गों को संरचनात्मक आधार प्रदान करते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था
के परिवहन सेक्टर में महासागरीय मार्गों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत में भार के अनुसार लगभग 95% तथा मूल्य के अनुसार 70% विदेशी व्यापार महासागरीय मार्गों द्वारा होता है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के साथ-साथ इन मार्गों का उपयोग देश की मुख्य भूमि तथा द्वीपों के बीच परिवहन के लिए भी होता है।


वायु परिवहन
भारत में वायु परिवहन की शुरुआत 1911 में हुई, जब इलाहाबाद से नैनी तक की 10 कि.मी. की दूरी हेतु वायु डाक प्रचालन संपन्न किया गया था। लेकिन इसका वास्तविक विकास देश की स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात् हुआ।

भारतीय वायु प्राधिकरण (एयर अथॉरिटी ऑफ इंडिया) भारतीय वायुक्षेत्र में सुरक्षित, सक्षम वायु यातायात एवं वैमानिकी संचार सेवाएँ प्रदान करने के लिए उत्तरदायी है। यह प्राधिकरण 126 विमान पत्तनों का प्रबंधन करता है जिसके अंतर्गत 11 अंतर्राष्ट्रीय, 86 घरेलू तथा रक्षा वायु क्षेत्रों पर स्थित 29 नागरिक अंतः क्षेत्र (इंक्लेव) शामिल हैं।

राष्ट्रीयकरण के बाद भारत में वायु परिवहन का प्रबंधन दो निगमों – एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन द्वारा किया जाता है।

अब अनेक निजी कंपनियों ने भी यात्री सेवाएं देनी प्रारंभ कर दी हैं।
एयर इंडिया
एयर इंडिया यात्रियों तथा नौभार यातायात, दोनों के लिए, अंतर्राष्ट्रीय वायु सेवाएँ उपलब्ध कराता है। यह अपनी सेवाओं द्वारा विश्व के सभी महाद्वीपों को जोड़ता है। वर्ष 2005 में इसने 1.22 करोड़ यात्रियों तथा 4.8 लाख टन नौभार का वहन किया।


कुल वायु यातायात का लगभग 52% भाग केवल मुंबई एवं दिल्ली विमानपत्तनों द्वारा निपटाया गया था।

वर्ष 2005 में घरेलू प्रचालन के अंतर्गत 24.3 मिलियन यात्री तथा 20 लाख टन नौभार शामिल था।

पवन हंस एक हेलीकॉप्टर सेवा है जो पर्वतीय क्षेत्रों में सेवारत है और उत्तर-पूर्व सेक्टर में व्यापक रूप से पर्यटकों द्वारा उपयोग में लाया जाता है। इसके अतिरिक्त पवन हंस लिमिटेड मुख्यतः पेट्रोलियम सेक्टर के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएँ उपलब्ध कराता है।

तेल एवं गैस पाइप लाइन
पाइप लाइनें गैसों एवं तरल पदार्थों के लंबी दूरी तक परिवहन हेतु अत्यधिक सुविधाजनक एवं सक्षम परिवहन प्रणाली है। यहाँ तक की इनके द्वारा ठोस पदार्थों को भी घोल या गारा में बदलकर परिवहित किया जा सकता है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के प्रशासन के अधीन स्थापित आयल इंडिया लिमिटेड
(ओ.आई.एल.) कच्चे तेल एवं प्राकृतिक गैस के अन्वेषण, उत्पादन और परिवहन में संलग्न है।

इसे 1959 में एक कंपनी के रूप में निगमित किया गया था।

एशिया की पहली 1157 कि.मी. लंबी देशपारीय पाइपलाइन (असम के नहरकरिटया तेल क्षेत्र से
बरौनी के तेल शोधन कारखाने तक) का निर्माण आई ओ.एल. ने किया था। इसे 1966 में और आगे कानपुर तक विस्तारित किया गया। पश्चिम भारत में एक दूसरे विस्तीर्ण पाइप लाइन का
महत्वपूर्ण नेटवर्क- अंकलेश्वर-कोयली, मुंबई-हाई-कोयली तथा हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) का निर्माण किया गया।


हाल ही में, 1256 कि.मी. लंबी एक पाइप लाइन सलाया (गुजरात) से मथुरा (उ.प्र.) तक बनाई गई है। गुजरात से पंजाब वाया मथुरा कच्चे तेल की आपूर्ति की जाती है। इसके साथ
ओ.आई.एल. द्वारा नुमालीगढ़ से सिलीगुड़ी तक 660 कि.मी. लंबी पाइप लाइन बनाने की प्रक्रिया चल रही है।


संचार जाल
मानव ने कालांतर में संचार के विभिन्न माध्यम विकसित किए हैं। आरंभिक समय में ढोल या पेड़ के खोखले तने को बजाकर, आग या धुएँ के संकेतों द्वारा अथवा तीव्र धावकों की
सहायता से संदेश पहुँचाए जाते थे।  उस समय घोड़े, ऊँट, कुत्ते, पक्षी तथा अन्य पशुओं को भी संदेश पहुँचाने के लिए प्रयोग किया जाता था। आरंभ में संचार के साधन ही परिवहन के
साधन होते थे।

डाकघर, तार, प्रिंटिंग प्रेस, दूरभाष तथा उपग्रहों की खोज ने संचार को बहुत त्वरित एवं आसान बना दिया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ने संचार के क्षेत्र में क्रांति लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
संदेश पहुँचाने के लिए लोग संचार की विभिन्न मापदंड एवं गुणवत्ता के आधार पर संचार साधनों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

वैयक्तिक संचार तंत्र
उपर्युक्त सभी वैयक्तिक संचार तंत्रों में इंटरनेट सर्वाधिक प्रभावी है। नगरीय क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर प्रयोग किया जाता है। यह उपयोगकर्ता को ई-मेल के माध्यम से ज्ञान एवं सूचना की दुनिया में सीधे पहुँच बनाने में सहायक होता है।

यह ई-कॉमर्स तथा मौद्रिक लेन-देन के लिए अधिकाधिक प्रयोग में लाया जा रहा है। इंटरनेट विभिन्न मदों पर विस्तृत जानकारी सहित आँकड़ों का विशाल केंद्रीय भंडारागार जैसा होता है।



जनसंचार तंत्र
रेडियो
भारत में रेडियो का प्रसारण सन् 1923 में रेडियोक्लबऑफ बाम्बे द्वारा प्रारंभ किया गया था। 1930 में इंडियन ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम के अंतर्गत इस लोकप्रिय संचार माध्यम को अपने नियंत्रण में ले लिया।

1936 में इसे ऑल इंडिया रेडियो और 1957 में आकाशवाणी में बदला दिया गया। ऑल इंडिया रेडियो सूचना, शिक्षा एवं मनोरंजन से जुड़े विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों को प्रसारित करता है।


टेलीविज़न (टी.वी.)
सूचना के प्रसार और आम लोगों को शिक्षित करने में टेलीविज़न प्रसारण एक अत्यधिक प्रभावी दृश्य-श्रव्य माध्यम है। प्रारंभिक दौर में टी.वी. सेवाएँ केवल राष्ट्रीय राजधानी तक सीमित थीं, जहाँ इसे 1959 में प्रारंभ किया गया था। 1972 के बाद कई अन्य केंद्र चालू हुए। सन् 1976 में टी.वी. को ऑल इंडिया रेडियो (ए.आई.आर.) से विगलित कर दिया गया और इसे दूरदर्शन (डी.डी.) के रूप में एक अलग पहचान दी गई। इनसैट (INSAT) 1ए (राष्ट्रीय टेलीविजन डीडी-1) के चालू होने के बाद समूचे नेटवर्क के लिए साझा राष्ट्रीय कार्यक्रमों (सीएनपी) की शुरुआत की गई और इन्हें देश-भर के पिछड़े और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तारित किया गया।


उपग्रह संचार
उपग्रह, संचार की स्वयं में एक विधा हैं और ये संचार के अन्य साधनों का भी नियमन करते हैं। उपग्रह से प्राप्त चित्रों का मौसम के पूर्वानुमान, प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी, सीमा क्षेत्रों की चौकसी आदि के लिए उपयोग किया जा सकता है।

भारत की उपग्रह प्रणाली को समाकृति तथा उद्देश्यों के आधार पर दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है- इंडियन नेशनल सेटेलाइट सिस्टम (INSAT) तथा इंडियन रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट सिस्टम (IRS)। इनसैट (INSAT), जिसकी स्थापना 1983 में हुई थी, एक बहुउद्देश्यीय उपग्रह प्रणाली है जो दूरसंचार, मौसम विज्ञान संबंधी अवलोकनों तथा विभिन्न अन्य आँकड़ों एवं कार्यक्रमों के लिए उपयोगी है।

आई आर एस उपग्रह प्रणाली मार्च 1988 में रूस के वैकानूर से आई आर एस-वन ए (IRS-IA) के प्रक्षेपण के साथ आरंभ हो गई थी। भारत ने भी अपना स्वयं का प्रक्षेपण वाहन पी एस एल वी (पोलर सेटेलाइट लाँच वेहकिल विकसित किया। ये उपग्रह अनेक वर्णक्रमीय (स्पेक्ट्रल) बैंड
(समूह) को एकत्रित करते हैं तथा विविध उपयोगों हेतु भू-स्टेशनों पर संप्रेषित करते हैं।

हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट सेंसिंग एजेंसी (NRSA) आँकड़ों के अधिग्रहण एवं प्रक्रमण
की सुविधा उपलब्ध कराती है। प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के लिए ये बहुत ही उपयोगी होते हैं।



राष्ट्रीय महामार्ग विकास परियोजनाएँ


भारतीय राष्ट्रीय महामार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) ने देश-भर में विभिन्न चरणों में कई प्रमुख परियोजनाओं की जिम्मेदारी ले रखी है।


Q. स्वर्णिम चतुर्भुज (Golden Quadrilateral) से क्या समझते हो ?
परियोजना : इसके अंतर्गत 5,846 कि.मी. लंबी 4/6 लेन वाले उच्च सघनता के यातायात गलियारे शामिल हैं जो देश के चार विशाल महानगरों- दिल्ली- मुंबई-चेन्नई-कोलकाता को जोड़ते हैं। स्वर्णिम चतुर्भुज के निर्माण के साथ भारत के इन महानगरों के बीच समय-दूरी तथा यातायात की लागत महत्वपूर्ण रूप से कम होगी।


उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम गलियारा (North-South Corridor) : उत्तर-दक्षिण गलियारे का उद्देश्य जम्मू व कश्मीर के श्रीनगर से तमिलनाडु के कन्याकुमारी (कोच्चि-सेलम पर्वत स्कंध सहित) को 4,016 कि.मी. लंबे मार्ग द्वारा जोड़ना है। पूर्व एवं पश्चिम गलियारे का उद्देश्य असम में सिलचर से गुजरात में पोरबंदर को 3640 कि.मी. लंबे मार्ग द्वारा जोड़ना है।

SOME OTHER IMPORTANT POINTS

कोंकण रेलवे
1998 में कोंकण रेलवे का निर्माण भारतीय रेल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह 760 कि.मी. लंबा रेलमार्ग महाराष्ट्र में रोहा को कर्नाटक के मंगलौर से जोड़ता है। यह रेलमार्ग 146 नदियों व धाराओं तथा 2000 पुलों एवं 91 सुरंगों को पार करता है। इस मार्ग पर एशिया की सबसे लंबी 6.5 कि.मी. की सुरंग भी है। इस उद्यम में कर्नाटक, गोवा तथा महाराष्ट्र राज्य भागीदार हैं।


इंडियन एयरलाइंस का इतिहास
1911 – भारत में वायु परिवहन सेवा की शुरुआत इलाहाबाद से नैनी के बीच की गई थी।
1947- वायु परिवहन मुख्यत: 4 प्रमुख कंपनियों-इंडियन नेशनल एयरवेज, टाटा संस लिमिटेड, एयर सर्विसेज ऑफ इंडिया तथा डकन एयरवेज द्वारा उपलब्ध कराई जाती थी।
1951 – चार और कंपनियाँ – भारत एयरवेज, हिमालयन एवीएशन लि., एयरवेज इंडिया तथा कलिंगा एयरलाइंस इस सेवा में शामिल हुई।
1953 – वायु परिवहन का राष्ट्रीयकरण करके दो निगम – एयर इंडिया लिमिटेड तथा इंडियन एयरलाइंस का गठन किया गया। अब इंडियन एयरलाइंस को ‘इंडियन’ के नाम से जाना जाता है।

देश की विशालतम राजकीय स्वामित्व वाले घरेलू वाहक इंडियन एयरलाइंस ने अपने नाम के साथ से ‘एयरलाइंस’ शब्द को विगलित कर दिया और इसे 8 दिसंबर 2005 से केवल ‘इंडियन’ नाम से जाना जाता है।
यह नया ब्रांड नाम वायुयान के धड़ के दोनों तरफ़ दर्शित है। नारंगी रंग की पूंछ पर चित्रित लोगो आई ए (IA) को भी बदल दिया गया है। इसे नए लोगो द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है, जो अंशतः नीले चक्र की भाँति दिखता है और (उड़ीसा के) कोणार्क सूर्य मंदिर के अनुप्रेरित है तथा निरंतर गति अभिसरण एवं अपसरिता को दर्शाता है।

भारतीय निर्यातकों को मदद देने तथा उनके निर्यात को प्रतियोगितापूर्ण बनाने के लिए सरकार ने अप्रैल 1992 में नौभार के लिए एक मुक्त आकाश नीति आरंभ की। इस नीति के अंतर्गत विदेशी एयरलाइंस या निर्यातकों का संगठन कोई भी मालवाहक वायुयान देश में ला सकता है।


शेरशाह सूरी ने अपने साम्राज्य को सिंधु घाटी (पाकिस्तान) से लेकर बंगाल की सोनार घाटी तक सुदृढ़ एवं संघटित (समेकित) रखने के लिए शाही राजमार्ग का निर्माण कराया था। कोलकाता से पेशावर तक जोड़ने वाले इसी मार्ग को ब्रिटिश शासन के दौरान ग्रांड ट्रंक (जी. टी.) रोड
के नाम से पुनः नामित किया गया था। वर्तमान में यह अमृतसर से कोलकाता के बीच विस्तृत है और इसे दो खंडों में विभाजित किया गया है (क) राष्ट्रीय महामार्ग NH-1 दिल्ली से अमृतसर तक और (ख) राष्ट्रीय महामार्ग NH-2 दिल्ली से कोलकाता तक

Q. रेलवे पटरी की चौड़ाई के आधार पर भारतीय रेल के तीन वर्ग बताये lबड़ी लाइन (Broad Guage) – ब्रॉड गेज में रेल पटरियों के बीच की दूरी 1.616 मीटर होती है। ब्रॉड गेज लाइन की कुल लंबाई 46,807 कि.मी. है जो कि देश के कुल रेलमार्गों के लंबाई का 74.14 प्रतिशत है।

मीटर लाइन (Meter Guage) – इसमें दो रेल पटरियों के बीच की दूरी एक मीटर होती है। इसकी कुल लंबाई 13,290 कि.मी. है जो देश के कुल रेलमार्ग की लंबाई का 21.02 प्रतिशत है।

छोटी लाइन (Narrow Guage) – इसमें दो रेल पटरियों के बीच की दूरी 0.762 मीटर या 0.610 मीटर होती है। इसकी कुल लंबाई 3,124 कि.मी. है जो भारतीय रेल की कुल लंबाई का 4.94 प्रतिशत है। यह प्रायः पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित है।

OTHER IMPORTANT QUESTION WITH ANSWER FOR BOARD EXAM 2020

1 पूर्व तथा पश्चिम गलियारे के अंतिम स्टेशन सिल्चर और पोरबंदर है

2 भारत में सबसे लम्बा राष्ट्रीय महामार्ग NH 7 है ( वाराणसी से कन्याकुमारी तक )

3 भारत में 11 अंतर्राष्ट्रीय विमान पतन है

4 प्रसार भारती का गठन 1997 में हुआ

5 संचार तंत्रो के तीन रूप भौतिक, तार द्वारा, वायु तरंगो द्वारा

6 एयर इंडिया भारत के सभी महाद्वीप को जोरती है

7 भारत में उत्तरी रेलवे का मुख्यालय न्यू दिल्ली है

8 सड़क मार्ग के क्या कमियां है ?

1 सड़क मार्ग महंगे होते है 2 अधिक दुरी तक भरी वास्तु का परिवहन नहीं होता है 3 दुर्घटना बहुत होती है 4. इनसे वायु प्रदूषण होता है

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