1. जनसंख्याः वितरण, घनत्व, वृद्धि और संघटन

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भारत अपनी 121.02 (2011) जनसंख्या के साथ चीन के बाद विश्व में दूसरा सघनतम बसा हुआ देश है। विश्व में प्रत्येक 6 व्यक्तियो में से एक भारतीय है
भारत की जनसंख्या उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और आस्ट्रेलिया को मिलाकर कुल जनसंख्या से भी अधिक है।

(बड़ी जनसंख्या निश्चित तौर पर इसके सीमित संसाधनों पर दबाव डालती है और देश में अनेक सामाजिक, आर्थिक समस्याओं के लिए उत्तरदायी हैं।)

जनसंख्या आँकड़ों के स्रोत हमारे देश में जनसंख्या के आँकड़ों को प्रति दस वर्ष बाद होने वाली जनगणना द्वारा एकत्रत किया जाता है।
भारत की पहली जनगणना 1872 ई. में हुई थी किंतु पहली संपूर्ण जनगणना 1881 ई. में हुई थी।
Q. भारत में जनसंख्या के वितरण का प्रतिरूप अत्यधिक असमान है। व्याख्या करे l
उत्तर प्रदेश की जनसंख्या सर्वाधिक है, इसके पश्चात महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश का स्थान है।
तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और गुजरात के साथ उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश की जनसंख्या मिलकर देश की कुल जनसंख्या का 76 प्रतिशत भाग है।
दूसरी ओर जम्मू और कश्मीर (0.98%), अरुणाचल प्रदेश (0.11%) और उत्तरांचल (0.83%) जैसे राज्यों की जनसंख्या का आकार इनके विशाल भौगोलिक क्षेत्र के बावजूद अत्यंत छोटा है।
भारत में जनसंख्या का ऐसा असम स्थानिक वितरण देश की जनसंख्या और भौतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक कारकों के बीच घनिष्ठ संबंध प्रकट करता है।

भौतिक कारक ये कारक जनसंख्या वितरण को प्रभावित करती है भू-विन्यास और जल की
उपलब्धता के साथ जलवायु प्रमुख रूप से वितरण के प्रतिरूपों का निर्धारण करती हैं। परिणामस्वरूप हम देखते हैं कि उत्तर भारत के मैदानों, डेल्टाओं और तटीय मैदानों में जनसंख्या का अनुपात दक्षिणी और मध्य भारत के राज्यों के आंतरिक जिलों, हिमालय, उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी कुछ राज्यों की अपेक्षा उच्चतर है।

सिंचाई के विकास (राजस्थान), खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता (झारखंड) और परिवहन जाल के विकास (प्रायद्वीपीय राज्यों) के परिणामस्वरूप उन क्षेत्रों में जो पहले न्यूनावासी थे वहाँ अब मध्यम से उच्च जनसंख्या अनुपात पाया जाता है।

जनसंख्या वितरण के सामाजिक,आर्थिक और ऐतिहासिक कारक में से महत्त्वपूर्ण कारक स्थायी कृषि का उद्भव और कृषि विकास, मानव बस्ती के प्रतिरूप, परिवहन जाल-तंत्र का
विकास, औद्योगीकरण और नगरीकरण हैं।

भारत के नदीय मैदानों और तटीय क्षेत्रों में स्थित प्रदेश सदैव ही विशाल जनसंख्या सांद्रण वाले प्रदेश रहे हैं। यद्यपि इन प्रदेशों में जमीन और जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों में, उपयोग के कारण निम्नीकरण हुआ है, फिर भी मानव बस्ती के आरंभिक इतिहास और परिवहन जाल-तंत्र के विकास के कारण जनसंख्या का सांद्रण उच्च बना हुआ है। दूसरी ओर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलौर, पुणे, अहमदाबाद, चेन्नई और जयपुर के नगरीय क्षेत्र औद्योगिक विकास और नगरीकरण के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण-नगरीय प्रवासियों को आकर्षित कर रहे हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में जनसंख्या का उच्च सांद्रण पाया जाता है।

जनसंख्या का घनत्व किसे कहते है ?
जनसंख्या के घनत्व को प्रति इकाई क्षेत्र में व्यक्तियों की संख्या द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। भारत का जनसंख्या घनत्व 313 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. (2001) है जो एशिया के सघनतम बसे देशों बांग्लादेश (849 व्यक्ति) और जापान (334 व्यक्ति) के बाद तृतीय स्थान पर है।

1951 ई. में जनसंख्या का घनत्व 117 व्यक्ति/वर्ग कि.मी. से बढ़कर 2001 में 313 व्यक्ति/प्रतिवर्ग कि.मी. होने से विगत 50 वर्षों में 200 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. की उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है।
अरुणाचल प्रदेश में कम से कम 13 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी.से लेकर दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 9,340 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. तक है। उत्तरी भारत के राज्यों पश्चिम बंगाल (903), बिहार (880) और उत्तर प्रदेश (690) में जनसंख्या घनत्व उच्चतर है जबकि प्रायद्वीपीय भारत के राज्यों में केरल (819) और तमिलनाडु (480) में उच्चतर घनत्व पाया जाता है। असम, गुजरात, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, उड़ीसा में मध्यम घनत्व पाया जाता है। हिमालय प्रदेश के पर्वतीय राज्यों और असम को छोड़कर भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अपेक्षाकृत निम्न घनत्व हैं जबकि अंडमान और निकोबार द्वीपों को छोड़कर केंद्र-शासित प्रदेशों में जनसंख्या के उच्च घनत्व पाए जाते हैं

कायिक घनत्व = कुल जनसंख्या / निवल कृषित क्षेत्र।
कृषीय घनत्व = कुल कृषि जनसंख्या / निवल कृषित क्षेत्र।
कृषि जनसंख्या में कृषक, कृषि मजदूर और उनके परिवार के सदस्य सम्मिलित होते हैं।

जनसंख्या की वृद्धि किसे कहते है ? जनसंख्या वृद्धि दो समय बिंदुओं के बीच किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की संख्या में परिवर्तन को कहते हैं। इसकी दर को प्रतिशत में अभिव्यक्त किया जाता है। जनसंख्या वृद्धि के दो घटक होते हैं, जिनके नाम हैं-प्राकृतिक (Natural) और अभिप्रेरित (Induced) जबकि प्राकृतिक वृद्धि का विश्लेषण अशोधित जन्म और मृत्यु दरों से निर्धारित किया जाता है, अभिप्रेरित घटकों को किसी दिए गए क्षेत्र में लोगों के अंतर्वर्ती और बहिर्वर्ती संचलन की प्रबलता द्वारा स्पष्ट किया जाता है।


भारत की जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर 2.4 प्रतिशत है। वृद्धि की इस वर्तमान दर से अनुमान लगाया गया है कि अगले 36 वर्षों में देश की जनसंख्या दुगुनी हो जाएगी और यहाँ तक कि चीन की जनसंख्या को भी पार कर जाएगी।

जनसंख्या के दुगुना होने का समय जनसंख्या के दुगुना होने का समय वर्तमान वार्षिक वृद्धि
दर पर किसी भी जनसंख्या के दुगुना होने में लगने वाला समय है।
पिछले एक शताब्दी में भारत में जनसंख्या की वृद्धि,वार्षिक जन्म दर और मृत्यु दर तथा प्रवास की दर के कारण हुई है और इसलिए यह वृद्धि विभिन्न प्रवृत्तियों को दर्शाती है। इस अवधि में वृद्धि की चार सुस्पष्ट प्रावस्थाओं को पहचाना गया है:


प्रावस्था क : 1901 से 1921 की अवधि को भारत की जनसंख्या की वृद्धि की रूद्ध अथवा स्थिर प्रावस्था कहा जाता है क्योंकि इस अवधि में वृद्धि दर अत्यंत निम्न थी, यहाँ तक कि 1911-1921 के दौरान ऋणात्मक वृद्धि दर दर्ज की गई। जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ऊँचे थे जिससे वृद्धि दर निम्न बनी रही निम्न स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाएँ, अधिकतर लोगों की निरक्षरता, भोजन और अन्य आधारभूत आवश्यकताओं का असमान वितरण इस अवधि
में मोटे तौर पर उच्च जन्म और मृत्यु दरों के लिए उत्तरदायी थे।


प्रावस्था ख : 1921-1951 के दशकों को जनसंख्या की स्थिर वृद्धि की अवधि के रूप में जाना जाता है। देश-भर में स्वास्थ्य और स्वच्छता में व्यापक सुधारों ने मृत्यु दर को नीचे ला दिया। साथ ही साथ बेहतर परिवहन और संचार तंत्र से वितरण प्रणाली में सुधार हुआ। फलस्वरूप अशोधित जन्म दर ऊँची बनी रही जिससे पिछली प्रावस्था की तुलना में वृद्धि दर उच्चतर हुई। 1920 के दशक की महान आर्थिक मंदी और द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में यह
वृद्धि दर प्रभावशाली थी।


प्रावस्था ग : 1951-81 के दशकों को भारत में जनसंख्या विस्फोट की अवधि के रूप में जाना जाता है। यह देश में मृत्यु दर में तीव्र ह्रास और जनसंख्या की उच्च प्रजनन दर के कारण हुआ। औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत तक ऊँची रही। अर्थव्यवस्था सुधरने लगी जिससे अधिकांश लोगों के जीवन की दशाओं में सुधार सुनिश्चित हुआ। परिणामस्वरूप जनसंख्या की प्राकृतिक वृद्धि उच्च और वृद्धि दर उच्चतर हुई। इन सबके अतिरिक्त तिब्बतियों, बांग्लादेशियों,
नेपालियों को देश में लाने वाले बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय प्रवास और यहाँ तक कि पाकिस्तान से आने
वाले लोगों ने भी उच्च वृद्धि दर में योगदान दिया।


प्रावस्था घ : 1981 के पश्चात् वर्तमान तक देश की जनसंख्या की वृद्धि दर, यद्यपि ऊँची बनी
रही, परंतु धीरे-धीरे मंद गति से घटने लगी ऐसी जनसंख्या वृद्धि के लिए अशोधित जन्म दर को उत्तरदायी माना जाता है। बदले में यह देश में विवाह के समय औसत आयु में वृद्धि जीवन की गुणवत्ता विशेष रूप से स्त्री शिक्षा में सुधार से प्रभावित हुई। देश में जनसंख्या की वृद्धि दर अभी भी ऊँची है और विश्व विकास रिपोर्ट द्वारा यह प्रक्षेपित किया गया है कि 2025 ई. तक भारत की जनसंख्या 135 करोड़ हो जाएगी

जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय भिन्नताएँ
1991-2001 के दौरान भारत के राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में जनसंख्या की वृद्धि दर सुस्पष्ट प्रतिरूप दर्शाती है।
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, पांडिचेरी और गोआ जैसे राज्यों में निम्न वृद्धि दर पाई जाती है जो दशक में 20 प्रतिशत से अधिक नहीं हुई। केरल में न केवल
इस वर्ग के राज्यों में बल्कि पूरे देश में भी निम्नतम वृद्धि दर दर्ज की गई है।

देश के उत्तर-पश्चिमी, उत्तरी और उत्तर-मध्य भागों में पश्चिम से पूर्व स्थित राज्यों की एक सतत पेटी में दक्षिणी राज्यों की अपेक्षा उच्च वृद्धि दर पाई जाती है। इस पेटी के
राज्यों जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, मध्य प्रदेश, सिक्किम, असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड में औसत वृद्धि दर
20-25 प्रतिशत रही।

भारत में जनसंख्या वृद्धि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसके किशोरों की वृद्धि है। वर्तमान में किशोरों अर्थात् 10-19 वर्ष का आयु वर्ग का अंश 22 प्रतिशत है (2001), जिसमें 53 प्रतिशत
किशोर और 47 प्रतिशत किशोरियाँ सम्मिलित हैं।

इन किशोरों का समाज के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं जिनमें से कुछ विवाह की निम्न आयु,
निरक्षरता, विशेषतः स्त्री निरक्षरता, विद्यालय विरतछात्र (school dropout), पोषकों की निम्न ग्राह्यता, किशोरी माताओं में उच्च मातृ मृत्यु दर, एच.आई.वी./एड्स के संक्रमण की उच्च दरें, शारीरिक और मानसिक अपंगता अथवा मंदता, औषध दुरुपयोग और मदिरोन्मत्तता किशोर अपचार और अपराध करना इत्यादि हैं।

राष्ट्रीय युवा नीति एक ऐसा उदाहरण है जिसे हमारी विशाल, युवा और किशोर जनसंख्या के समग्र विकास की देखरेख हेतु लागु किया गया है 2003 ई. में प्रायोजित की गई भारत सरकार की युवा नीति, युवाओं और किशोरों के चौमुखी विकास पर बल देती है ताकि देश के रचनात्मक विकास में वे अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने में सक्षम हो सकें। इसका उद्देश्य देशभक्ति और उत्तरदायी नागरिकता के गुणों का प्रबलन भी है।

इस नीति का मुख्य ध्येय, निर्णय लेने में युवाओं की प्रभावी सहभागिता और एक सुयोग्य नेतृत्व के उत्तरदायित्वों के निर्वहन के संदर्भ में उनको सशक्त करना है। महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया गया ताकि पुरुषों और महिलाओं की स्थिति में समता लाई जा सके। इनके अतिरिक्त युवाओं के स्वास्थ्य, क्रीड़ा और प्रमोद, रचनात्मकता और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में नए परिवर्तनों के बारे में जागरूकता की देखरेख हेतु सोचे-समझे प्रयत्न किए गए।

जनसंख्या संघटन
जनसंख्या संघटन, जनसंख्या भूगोल के अंतर्गत अध्ययन का एक सुस्पष्ट क्षेत्र है जिसमें आयु व लिंग का विश्लेषण, निवास का स्थान, मानवजातीय लक्षण, जनजातियाँ, भाषा, धर्म, वैवाहिक
स्थिति, साक्षरता और शिक्षा, व्यावसायिक विशेषताएँ आदि का अध्ययन किया जाता है। इस खंड में ग्रामीण-नगरीय विशेषताओं, भाषा, धर्म और व्यवसाय के प्रतिरूपों के संदर्भ में भारत की जनसंख्या के संघटन की विवेचना की जाएगी।

ग्रामीण-नगरीय संघटन
अपने-अपने निवास के स्थानों के अनुसार जनसंख्या का संघटन सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं का एक महत्त्वपूर्ण सूचक है। जब देश की कुल जनसंख्या का 72 प्रतिशत भाग गाँवों में रहता हो तब यह और भी सार्थक हो जाता है।

सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 638588 गाँव हैं जिनमें से 593,731 (93
प्रतिशत) गाँव बसे हुए हैं फिर भी पूरे देश में ग्रामीण जनसंख्या का वितरण समान नहीं है। बिहार और सिक्किम जैसे राज्यों में ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत बहुत अधिक है। गोआ और महाराष्ट्र राज्यों की कुल जनसंख्या का आधे से कुछ अधिक भाग गाँवों में बसता है।

दूसरी ओर दादरा और नगर हवेली (77.1 प्रतिशत) को छोड़कर केंद्र-शासित प्रदेशों का लघु अनुपात ही ग्रामीण जनसंख्या का है। गाँवों का आकार भी काफ़ी हद तक भिन्न है। उत्तर-पूर्वी भारत के पहाड़ी राज्यों, पश्चिमी राजस्थान और कच्छ के रन में यह 200 व्यक्तियों से कम और केरल व महाराष्ट्र के कुछ भागों में यह 17,000 व्यक्ति तक पाया जात है।

भारत की ग्रामीण जनसंख्या के वितरण के प्रतिरूप का संपूर्ण परीक्षण उजागर करता है कि अंतर-राज्य और अंत:राज्य दोनों स्तरों पर नगरीकरण का सापेक्षिक परिमाण और
ग्रामीण-नगरीय प्रवास का विस्तार ग्रामीण जनसंख्या के सांद्रण को नियंत्रित करते हैं।

भारत में नगरीय जनसंख्या का अनुपात (27.8 प्रतिशत) काफ़ी निम्न है किंतु पिछले दशकों में यह वृद्धि की बहुत तीव्र दर को दर्शा रहा है। वास्तव में 1931 ई. से नगरीय जनसंख्या की
वृद्धि दर संवृद्ध आर्थिक विकास, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संबंधी दशाओं में सुधार के कारण त्वरित हुई है।

सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में नगरीय जनसंख्या काफ़ी बढ़ी है। यह सामाजिक, आर्थिक दशाओं के संदर्भ में नगरीय क्षेत्रों के विकास और ग्रामीण-नगरीय प्रवास की बढ़ी हुई
दर दोनों को इंगित करता है।

भाषाई संघटन
भारत एक भाषाई विविधता की भूमि है। ग्रियर्सन के अनुसार (भारत का भाषाई सर्वेक्षण, 1903-1928) देश में 179 भाषाएँ और 544 के लगभग बोलियाँ थीं। आधुनिक भारत के संदर्भ में 18 भाषाएँ अनुसूचित हैं (1991 जनगणना) और अनेक भाषाएँ गैर-अनुसूचित हैं।

अनुसूचित भाषाओं में हिंदी बोलने वालों का प्रतिशत (40.42) सर्वाधिक है। लघुतम भाषा वर्ग कश्मीरी और संस्कृत बोलने वालों के हैं

धार्मिक संघटन
धर्म सर्वाधिक भारतीयों के सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित करने वाले प्रमुख बलों में से एक है। क्योंकि धर्म लोगों के परिवार और सामुदायिक जीवन के लगभग सभी पक्षों
में आभासी रूप से व्याप्त होता है,

देश में धार्मिक समुदायों का स्थानिक वितरण दर्शाता है कि कुछ निश्चित राज्यों और जिलों में एक धर्म की संख्यात्मक प्रबलता विशाल है, जबकि उसी का दूसरे राज्यों में प्रतिनिधित्व कम है।

भारत-बांग्लादेश सीमा व भारत-पाक सीमा से संलग्न जिलों, जम्मू और कश्मीर, उत्तर-पूर्व के पर्वतीय राज्यों और दक्कन पठार व गंगा के मैदान के प्रकीर्ण क्षेत्रों को छोड़कर हिंदू अनेक राज्यों में एक प्रमुख समूह के रूप में वितरित हैं

भाषाई वर्गीकरण
प्रमुख भारतीय भाषाओं के बोलने वाले चार भाषा परिवारों से जुड़े हुए हैं जिनके उप-परिवार, शाखाएँ अथवा वर्ग हैं


आस्ट्रिक (निषाद) 1.38% (उपपरिवार )आस्ट्रो-नेसियन, आस्ट्रो एशिया (शाखा वर्ग ) मान खमेर मुंडा (वाक क्षेत्र ) मेघालय, निकोबार द्वीप समूह पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, भारत के बाहर

द्रविड़ 20% (शाखा वर्ग ) दक्षिण द्रविड़ मध्य द्रविड़ उत्तर द्रविड़ (वाक क्षेत्र ) तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश

चीनी-तिब्बती (किरात) 0.85% (उपपरिवार ) तिब्बती-म्यांमारी, सियामी-चीनी (शाखा वर्ग ) तिब्बती हिमालयी उत्तरी असम असम-म्यांमारी (वाक क्षेत्र ) जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम अरुणाचल प्रदेश असम, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय

भारतीय-यूरोपीय (आर्य) 73% (उपपरिवार ) इंडो-आर्य (शाखा वर्ग ) इरानी (फारसी) दरदी भारतीय आर्य (वाक क्षेत्र ) भारत से बाहर जम्मू और कश्मीर जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार, उडीसा, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात, महाराष्ट्र.गोआ।

विशालतम धार्मिक अल्पसंख्यक मुस्लिम जम्मू और कश्मीर, पश्चिम बंगाल और केरल के कुछ जिलों, उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों, दिल्ली में व उसके आस पास और लक्षद्वीप में हैं।

ईसाई जनसंख्या अधिकांशतः देश के ग्रामीण क्षेत्रों में वितरित हैं। मुख्य सांद्रण पश्चिमी तट के साथ गोआ एवं केरल और मेघालय, मिजोरम और नागालैंड के पहाड़ी राज्यों, छोटानागपुर क्षेत्र और मणिपुर की पहाड़ियों में भी देखा जाता है।

अधिकांश सिक्ख देश के अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में संकेंद्रित हैं।

भारत के सबसे छोटे धार्मिक समूह जैन और बौद्ध देश के गिने-चुने क्षेत्रों में संकेंद्रित हैं। जैनियों का प्रमुख संकेंद्रण राजस्थान के नगरीय क्षेत्रों, गुजरात और महाराष्ट्र में है

जबकि बौद्ध अधिकांशत: महाराष्ट्र में संकेंद्रित हैं। बौद्ध बाहुल्य अन्य क्षेत्र सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर में लद्दाख, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में लाहुल और स्पिति हैं।

भारत के अन्य धर्मों में जरतुश्त, जनजातीय एवं अन्य देशज निष्ठाएँ और विश्वास सम्मिलित हैं। ये समूह छोटे समूहों में संकेंद्रित हैं और देश-भर में बिखरे हुए हैं।

श्रमजीवी जनसंख्या का संघटन
आर्थिक स्तर की दृष्टि से भारत की जनसंख्या को तीन वर्गों में बाँटा जाता है, जिनके नाम हैं-मुख्य श्रमिक, सीमांत श्रमिक और अश्रमिक
मानक जनगणना परिभाषा मुख्य श्रमिक वह व्यक्ति है जो एक वर्ष में कम से कम
183 दिन काम करता है।
सीमांत श्रमिक वह व्यक्ति है जो एक वर्ष में 183 दिनों से कम दिन काम करता है।
भारत में श्रमिकों (दोनों मुख्य और सीमांत) का अनुपात (2001) 39 प्रतिशत है जबकि 61
प्रतिशत की विशाल संख्या अश्रमिकों की है। यह एक आर्थिक स्तर को इंगित करता है जिसमें एक बड़ा अनुपात आश्रित जनसंख्या का है, जो आगे, बेरोजगार और अल्प रोजगार प्राप्त
लोगों की बड़ी संख्या के होने की संभावना की ओर इशारा करता है।


श्रम की प्रतिभागिता दर क्या होती है?
राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों श्रमजीवी जनसंख्या का अनुपात गोआ में लगभग 25 प्रतिशत, मिजोरम में लगभग 53 प्रतिशत सामान्य भिन्नता दर्शाता है। श्रमिकों के अपेक्षाकृत
अधिक प्रतिशत वाले राज्य हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मेघालय हैं। केंद्र-शासित प्रदेशों में दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव की प्रतिभागिता दर ऊंची है। भारत जैसे देश के संदर्भ में ऐसा समझा जाता है कि आर्थिक विकास के निम्न स्तरों वाले क्षेत्रों में श्रम की सहभागिता दर ऊंची है
क्योंकि निर्वाह अथवा लगभग निर्वाह की आर्थिक क्रियाओं के निष्पादन के लिए अनेक कामगारों की जरूरत पड़ती है।

भारत की जनसंख्या का व्यावसायिक संघटन (जिसका वास्तव में अर्थ किसी व्यक्ति के खेती, विनिर्माण व्यापार, सेवाओं अथवा किसी भी प्रकार की व्यावसायिक क्रियाओं में लगे होने से है)

द्वितीयक और तृतीयक सेक्टरों की तुलना में प्राथमिक सेक्टर के श्रमिकों के एक बड़े अनुपात को दर्शाता है। कुल श्रमजीवी जनसंख्या का लगभग 58.2 प्रतिशत कृषक और कृषि मजदूर हैं जबकि केवल 4.2 प्रतिशत श्रमिक घरेलू उद्योगों में लगे हैं और 37.6 प्रतिशत अन्य श्रमिक हैं जो गैर-घरेलू उद्योगों, व्यापार, वाणिज्य, विनिर्माण और मरम्मत तथा अन्य सेवाओं में कार्यरत हैं।

पुरुष श्रमिकों की संख्या स्त्री श्रमिकों की संख्या से तीनों सेक्टरों में अधिक है
व्यावसायिक संवर्ग
सन् 2001 की जनगणना ने भारत की श्रमजीवी जनसंख्या को चार प्रमुख संवर्गों में बाँटा है :
1. कृषक
2 कृषि मजदूर
3. घरेलू औद्योगिक श्रमिक
4. अन्य श्रमिक

महिला श्रमिकों की संख्या प्राथमिक सेक्टर में अपेक्षाकृत अधिक है यद्यपि विगत कुछ वर्षों में महिलाओं की द्वितीयक और तृतीयक सेक्टरों की सहभागिता में सुधार हुआ है। दिखाई दिया है (1991 में 66.85% से 2001 में 58.2%)
परिणामस्वरूप, द्वितीयक और तृतीयक सेक्टर में सहभागिता दर बढ़ी है यह श्रमिकों की खेत-आधारित रोजगारों पर निर्भरता से गैर-खेत आधारित रोज़गारों पर निर्भरता को इंगित करता है। यह देश की अर्थव्यवस्था में सेक्टरीय स्थानांतरण है।

Q. देश के विभिन्न सेक्टरों में श्रम सहभागिता दर की स्थानिक भिन्नता है उदाहरण सहित बताये l

उदाहरण के तौर परहिमाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे राज्यों में कृषकों की संख्या बहुत अधिक है। दूसरी ओर आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कृषि मज़दूरों की संख्या अधिक है। दिल्ली, चंडीगढ़ और पांडिचेरी जैसे अत्यधिक नगरीकृत क्षेत्रों में श्रमिकों का बहुत बड़ा अनुपात अन्य सेवाओं में लगा हुआ है। यह न केवल सीमित कृषि भूमि की उपलब्धता को बल्कि बृहत् स्तर पर होने वाले नगरीकरण और औद्योगीकरण द्वारा गैर-कृषि सेक्टरों में और अधिक श्रमिकों की आवश्यकता
को भी इंगित करता है।

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